साल 2012 की बात है, मेनें 10वी कक्षा की आखरी परीक्षा देदी थी और मे खुश था मानों जैसे सिर पर से एक बोझ हल्का हो गया था, लेकिन मन में डर भी था की कहीं मे फैल ना हो जाऊँ! मुझे ये बात अच्छे से मालूम थी कि एक ना एक दिन मम्मी पापा को ये बात जरूर पता चल ही जायेगी, की में फैल हो गया हूँ! खेर स्कुल के वो दिन भी क्या दिन थे यार!
वैसे पढ़ाई में मेरा कुछ खास ध्यान नहीं रहता था , बाकी सभी सब्जेक्ट में मेरी पढाई का लेवल ठीक ठाक ही था, लेकिन गणित का नाम सुनकर ही मेरे रोंगटे खड़े हो जाया करते थे, ये गणित मुझे बचपन से ही कुछ खास नहीं लगती थी, इसके अलावा परीक्षा और टेस्ट में भी मुझे बहुत ही कम नंबर मिला करते थे!
बल्कि मेरे साथ बैठने वाले दोस्तों को अच्छे खासे नम्बर मिल जाते थे , खेर जाने दो यार अब इस बारे में ज्यादा बात ना ही करू तो अच्छा होगा , शायद आप इस कहानी को पढ़ते हुए थोड़ा सा मुस्कुरा दे! ☺ जैसा कि मेने कहा कि गणित मेरी हमेशा से कमजोरी रही है इसी कारण से मेनें जैसे तेसै 10वी की पढाई पूरी की उन दिनों घर की परिस्थिति भी कुछ खास नहीं थी घर में अक्सर पैसों की तंगी रहती थी और मम्मी हाउस वाइफ थी!
पापा खेती का काम करते थे लेकिन घर का खर्चा मुश्किल से चलता था इसलिए मेने घर वालों की मदद और कुछ पैसे कमाने के लिए में मेरे गाँव दिवेर, जिला राजसमंद, राज्य राजस्थान से गुजरात के सिलवासा शहर में अपनी पहली नोकरी करने के लिए निकल पड़ा!
अजीब बात ये है कि में जहाँ पर नोकरी करने जा रहा था वह मेरे ही सगे मामा की पाव भाजी का ठेला था, उन दिनों उनके ठेले पर ग्राहकों की भीड़ लगा करती थी, उनके ठेले का नाम था : "देवनारायण पाव भाजी सेंटर" लेकिन उनके पहचान के ग्राहक उनको सिर्फ "देवनारायण" कह कर बुलाते थे!
वैसे मेरे वहाँ के कुछ कड़वे अनुभव रहे मामा के साथ मेरी कुछ खास नहीं बनती थी क्युकी वह कंजूस और खडूस था छोटी छोटी सी गलती पर वह जो भी उसके हाथ में आता उसी को उठाकर मार देता था, वह उसके पाव भाजी के ठेले पर काम खतम होने के बाद उसके घर का काम भी करवाता था! लेकिन अच्छी बात ये थी कि मेंने वहाँ पर प्याज और टमाटर की बारीक कटिंग करना सीख लिया था!
मामा की पत्नी और बच्चे बहुत ही आलसी थे हम थके हुए जब घर पर आते तो वे सब आराम से टीवी देखा करते थे मुझे पीने का पानी भरकर लाना पड़ता था और बर्तन भी धोने पड़ते, यहाँ पर मुझे थोड़ा सा गाली देने का मन कर रहा है लेकिन मे दूंगा नहीं!
फिर वह वक्त आया जब आखिर कार में अपने मामा के नर्क रूपी मायाजाल से बाहर निकला और में वहाँ से काम छोड़ कर गुजरात के पास ही बसे दमन शहर में जो की समुंदर के किनारे बसा हुआ है वहीं के पास मे ही एक प्लास्टिक के दानें बनाने वाली कंपनी में चाय पिलाने का काम करने लगा!
उस दोरान में समुंदर के किनारे भी कभी कभी घूमने चला जाया करता था, वहाँ का वातावरण शाम के वक्त बहुत ही सुहाना हुआ करता था , कंपनी ने मुझे बाजार से सामान वगेहरा लाने के लिए साइकल दे रखी थी , में फटाफट से कैंटिन का काम निपटा कर साइकल से घूमने निकल जाया करता था, वहाँ के पास में ही महादेव जी का सोमनाथ मन्दिर भी था, जहाँ साल में एक बार बहुत ही बड़ा मेला लगता था, आज भी लगता है और आगे भी लगता रहेगा!
मेने दमन में इसी तरह कुछ 2 महीने बिताए होंगे, फिर वहाँ पर भी कुछ बिहारी मजदूरों से चाय को लेकर मेरा झगड़ा हो गया था, मेने वहाँ से भी काम छोड़ दिया और वहीं दमन के पास मे ही एक घी बनाने वाली कंपनी में काम पर लग गया लेकिन कुछ वक्त बिताने के बाद मुझे वहाँ का माहौल भी पसन्द नहीं आया इसलिए मेने काम छोड़ दिया!
और में दुबारा मामा से मिला आपस में कहा सुनी हुई जबरदस्त बहस हुई, इसलिए मामा तो मामा होता है चाहे वह कलयुग का मामा हो या महाभारत का शकुनि और कंस मामा या फिर रावण का मामा मारीच!! खेर मुझे इन दुष्ट मामा लोगों के साथ कुछ खास जुड़ाव नहीं है यार! क्यों की ये मामा लोग सिर्फ अपने स्वार्थ की ही बातें करते हैं!
मामा ने मुझसे पूछा " क्यों रे? तु एक जगह टिक कर काम क्यों नहीं कर सकता है? क्या परेशानी है तुझे? " मेने कहा कि " आप मेरे लिए कोई की नोकरी हो तो बताओ मे जहाँ जहाँ से काम छोड़ कर आया हूँ कंही पर सोने और नहाने की सुविधा नहीं मिली तो कहीं पर टोइलेट की भी सुविधा नहीं थी, कहीं पर लोग अच्छा व्यवहार नहीं करते थे तो कहीं पर पगार समय पर नहीं देते थे, इसलिए मेनें काम छोड़ दिया आपकी नज़र में कोई ढंग की नोकरी करने लायक जगह हो तो बताओ नहीं तो में अपने घर वापस जा रहा हूँ! "
मामा मेरी बात समझ गए उन्होंने अपने किसी रिश्तेदार से बात करके मेरे लिए एक घटिया नोकरी ढूंढ ली थी वैसे मे घटिया इसलिए कह रहा हूँ क्युकी यहाँ पर सब सुविधा तो मिली मगर सैलरी बहुत ही कम दे रहे थे खेर, वैसे घर पर जाकर मटरगस्ति करने से तो अच्छा था कि में कम सैलरी में काम कर लूँ, कम से कम कुछ पैसें तो हाथ में आ जायेंगे है ना? वैसे मुद्दे पर वापस आते हैं जिस कंपनी में काम पर लगा था, उस कंपनी में पेंसिल बनाई जाती है तो अब शुरू होती है असली कहानी!
भाग: 2 डरावनी शुरुआत
खुश किस्मती से ये कंपनी मुझको भा गयी वैसे इस कंपनी में 2 शिफ्ट में काम होता है दिन वाली शिफ्ट और रात की शिफ्ट, इसमें कोई डाउट वाली बात नहीं है, मुझे रात की 10 और 12 बजे की चाय बनाने का काम सौंपा गया पहले तो मुझे बहुत परेशानी हुई क्योंकि कम्पनी बड़ी थी, और ऐसी जगह पर लोग काम करते थे जहाँ का वातावरण सुनसान और डरावना लगता था।
कोई बड़ा गोदाम पर तो कोई मशीन पर, रात के वक्त बहुत कम लोग काम करते थे। शुरुआत में मुझे नींद की झपकियाँ आ जाती थीं, लेकिन छोटे से मोबाइल में अलार्म भर के रखता था, तो मामला कन्ट्रोल में रहता था। धीरे-धीरे यहाँ के लोगों के साथ जान-पहचान बढ़ी, सिक्योरिटी गार्ड के साथ भी पहचान हुई।
कुछ दिन गुजरे फिर यहाँ के लोकल लोगों से एक बातचीत के दौरान पता चला कि ये कम्पनी जिस जगह पर बनाई गई है वह जगह एक शमशान की जमीन पर बनाई गई है। खैर सुनने में ही डरावना लगता है। दिन बीतते गए इस कम्पनी के वातावरण में पूरा घुल-मिल गया।
एक दिन एक सिक्योरिटी गार्ड जिसका सरनेम तिवारी था, उसको रात के 12 बजे की चाय देने में जब गोदाम में गया जहाँ वह एक छोटे से स्टूल पर बैठकर मेरी चाय लेकर आने का इंतज़ार कर रहा था। उस जगह पर वह अकेला ही बैठा था, मुझे जैसे ही उसने देखा तो वह खुश हो गया। मैंने उसको चाय दी, फिर वह बोला "हरीश! आज मेरे साथ एक काण्ड हो गया।"
मैंने कहा "क्या हुआ?" वह बताने लगा कि "आज मैं दिन को सही से सो नहीं पाया मेरी ड्यूटी शाम को 3:30 से लेकर रात 12:30 बजे तक रहती है, वैसे तो ज्यादातर मैं चालू ड्यूटी में सोता नहीं हूँ लेकिन आज अचानक मुझे नींद की झपकी आ गयी।
कुछ देर मैंने आँख बंद ही की थी किसी ने मुझे जोरदार थप्पड़ मारा। मैं हड़बड़ा कर जब उठकर देखा तो कोई भी दिखाई नहीं दिया। हरीश यहाँ पर कुछ तो है भाई।" मैंने कहा "ऐसा कुछ नहीं होता है भाई, चिन्ता मत करो, आराम से काम करो।"
इस घटना के बाद कुछ असली का अनुभव मेरे साथ भी होने लगा। कभी नींद में मुझे ऐसा लगता कि कोई मेरी छाती पर बैठ गया है, मैं लाख जागने की कोशिश करता हूँ लेकिन मैं हिल भी नहीं पाता हूँ।
कभी ऐसा खराब सपना आता कि कोई लड़की मेरे साथ कुछ गलत कर रही है, नींद खुलते ही कुछ देर तक उसका चेहरा मुझे दिखाई देता रहता फिर धीरे-धीरे धुँधला होकर गायब हो जाता। और तो और... मेरी आदत क्या है कि नींद में कभी उल्टा होकर सोता हूँ, कभी ऐसा लगता कि कोई मेरी पीठ पर नींद में थप्पड़ मार रहा है, मैं भड़क कर उठ जाता।
कभी ऐसा लगता कि दिन भर काम करने के बावजूद थकान होते हुए भी नींद ही नहीं आती देर रात तक, वैसे नींद ना आना एक मेडिकल परेशानी भी हो सकती है, लेकिन क्या हो कि अगर आप लाख सोने की कोशिश करें फिर भी आपको नींद ना आए, मन में एक अनजाना सा डर और चिन्ता आपको सताए।
दोस्तों ये बात आपको सुनने में शायद साधारण सी लग सकती है, लेकिन मेरे साथ ऐसा यहाँ पहली बार हुआ। वैसे मुझे घर पर नींद आने के लिए ज्यादा परेशानी नहीं होती थी लेकिन इस कम्पनी में मुझे नींद इतनी आसानी से नहीं आती थी।
और मेरे साथ काम करने वाले लोगों ने बताया कि "यहाँ पर पहले आपकी जगह एक और आदमी काम करके गया, वह भी बता रहा था कि किसी ने रात को उसका गला दबाने की कोशिश की, वह डरकर उस कमरे से निकल कर भाग गया था, फिर कम्पनी के एक ड्राइवर के साथ सोया था।" उसकी उस कमरे में उस रात अकेले सोने की हिम्मत नहीं हुई।
एक दिन ऑफिस में काम करने वाली पियॉन ने मुझे बताया कि "यहाँ पर एक बड़े लम्बे बाल वाला एक आदमी है जो किसी खास मौकों पर इस कम्पनी में घूमने आता है, उसका चेहरा किसी ने नहीं देखा है। वह होली, दिवाली जैसे त्योहारों के एक दिन पहले यहाँ आता है और कोई नींद में सोया रहता है, तो उसका नाम लेकर जोर से एक बार आवाज देकर कहीं गायब हो जाता है।"
जब मैंने इस बारे में यहाँ के साहब लोगों से बात की तो वह कहते कि (ये कुछ भी नहीं है ऐसा) यहाँ पर ये सब कुछ झूठी अफवाह है, जो लोगों द्वारा फैलाई गई है, लेकिन जो अनुभव मेरे साथ हुआ उसका क्या? उन्होंने इस बात का कोई जवाब नहीं दिया।
किसी तरह इन सभी को झेलते हुए मैंने 6 महीने पूरे किए, फिर घर से बुलावा आया। मैं फिर हर 6 महीने में एक बार घर पर जाता हूँ परिवार से मिलने के लिए, कभी इस कम्पनी में 2 साल के बाद आया लेकिन अजीब बात यह है कि मुझे फिर भी यहाँ पर काम मिल जाता।
आज मुझे इन सभी की आदत सी हो गई है; अब वो डरावने अनुभव बंद हो गए हैं। फिलहाल मैंने इस कम्पनी के अलावा...मेनें और भी दूसरी कम्पनियों में काम किया लेकिन पता नहीं क्यों मैं घूम-फिर कर दोबारा से इसी कम्पनी में आ जाता हूँ।
ये सिलसिला लगभग 10 सालों से लगातार चल रहा है, अब इस कहानी और मेरी आपबीती इस घटना को लिखने तक मैं इसी कम्पनी में काम कर रहा हूँ, अब भी वो डरावने अनुभव मेरे साथ होते हैं लेकिन कभी-कभी ही होते हैं।
वैसे दोस्तों ये एक रहस्य ही बना हुआ है, कि इन घटनाओं के पीछे की क्या वजह हो सकती है? खैर मिलते हैं अगली ओर एक नई कहानी में तब तक अपना और अपने परिवार का ध्यान रखना अलविदा दोस्तों!!!
इस कहानी की सच्चाई के सबूत के तौर पर मेरी डायरी के वो असली पन्ने, जो मैंने उसी कंपनी में काम करते हुए लिखे थे:
हालांकि पोस्ट में लिखी गई कहानी को थोड़ा और सुधार कर लिखा गया है!
लेखक: हरीश रावत।