जादुई मटके का रहस्य और अंत (भाग 2)
...मटके ने कहा, "जरूर! क्यों नहीं मारो लात मुझे और फोड़कर आगे बढ़ जाओ।"
जैसे ही उन कंकाल रूपी राक्षसों ने मटके को लात मारकर फोड़ने की कोशिश की, मटके ने अपनी जादुई शक्ति से उन दोनों राक्षसों के ऊपर आग बरसाई और उन्हें पल भर में जलाकर नष्ट कर दिया। इसके बाद वह दोबारा से शिविर की तरफ रखवाली करने चला गया।
अगली सुबह सभी चुपचाप वहाँ से रवाना हो गए। किसी को कुछ भी नहीं मालूम पड़ा! केवल मटके के अलावा ये राज कोई और नहीं जानता था कि रात को जंगल में क्या भयानक घटना घटी थी, जिसके बारे में हमने जादुई मटके का रहस्य (भाग 1) में विस्तार से जाना था।
ठीक दोपहर को वे लड़की वालों के यहाँ पहुँच गए, जहाँ उनका खूब स्वागत-सत्कार किया गया। लड़की के घर वाले भी अमीर और सम्पन्न परिवार से थे, अच्छे-खासे खाते-पीते घर के लोग थे।
साथ ही, लड़की को और उसके घर वालों को शादी से पहले ही ये बात साफ-साफ बता दी गई थी कि उनकी लड़की की शादी एक जादुई मटके के साथ होने वाली है। वे ताउम्र इस बात का ख्याल रखेंगे कि यह शादी लड़की और उसके परिवार की पूरी सहमति से हो रही है! वैसे, उमा ने जब लड़की का नाम पूछा तो पता चला कि उसका नाम रेवती था।
ये बात सुनकर मैं बीच में ही बोल पड़ा – "लेकिन दादी, एक लड़की एक मटके से शादी करने के लिए इतनी आसानी से मान कैसे गयी? और उसके परिवार को इससे कोई दिक्कत भी नहीं हुई? कमाल की बात है! मुझे तो यह किसी रहस्यमयी शापित कहानी की तरह लग रहा है।"
दादी का दिमाग थोड़ा गर्म हो गया, वो थोड़ी गुस्से में बोल पड़ीं, "अरे मूरख! पहले पूरी कहानी तो सुन ले! अभी मैं सब कुछ तुझे बता दूँगी तो कहानी का मजा ही खराब हो जायेगा।" मैंने कहा, "ठीक है, ठीक है दादी, मुझे माफ करना मुझसे गलती हो गयी। तो फिर आगे क्या हुआ?"
दादी ने कहा, "रुक जा तूने मेरा सारा मूड खराब कर दिया, मुझे एक बीड़ी पीने दे।" इतना कह कर दादी ने बीड़ी जलाई और जलाने के बाद माचिस मेरे मुँह पर दे मारी! 🤣 खैर!
फिर दादी ने बीड़ी का गहरा और दमदार सुट्टा मारा और आगे की कहानी बताना शुरू किया– "फिर मटके ने भी उस लड़की को देखा। उसको भी वह बहुत ही पसंद आई—खूबसूरत सी आँखें, गोरा रंग, तीखे नैन-नक्श और बहुत ही इज्जत से बात करने वाली संस्कारी लड़की। पहली नजर में ही मटके ने उसे पसंद कर लिया था! उसने माँ उमा को भी बता दिया कि उसे वह लड़की पसंद है और वह शादी करेगा तो इसी से!"
तो इस प्रकार से उनकी शादी तय हो गयी। कुछ महीने के बाद पूरी तैयारी और धूमधाम से, गाजे-बाजों के साथ उनकी शादी सम्पन्न हो गयी। फेरे लेते हुए भी वहाँ का नजारा कुछ अलग ही लग रहा था, जैसे किसी पुराने जमाने की डरावनी और अनोखी शादी की कहानी हो! खैर जो भी हो, आखिरकार यह अनोखी शादी हो ही गयी।
फिर दूल्हे और दुल्हन की घर वापसी हुई। सभी रस्मों-रिवाज के साथ उमा ने अपने बहू और बेटे का बहुत ही गर्मजोशी से स्वागत किया। आज उमा का वह सपना साकार हो चुका था जो वह कई सालों से भगवान कृष्ण की मूर्ति के सामने प्रार्थना करते हुए मांगा करती थी। आस-पास के पड़ोसी भी अब तो दुगुनी जलन से जल रहे थे, लेकिन वे भी ना चाहते हुए भी इस भव्य शादी के समारोह में शामिल हुए।
फिर मटके की सुहागरात की तैयारी की गयी, उनके लिए कमरा सजाया गया। वक्त बीतने लगा, कुछ महीने तक सब कुछ सही चला। फिर धीरे-धीरे मटके और रेवती के बीच में गहरा प्रेम हुआ। लेकिन उमा को मन ही मन इस बात का मलाल था कि चाहे मटका मेरा बेटा ही है, लेकिन वह इंसानी रूप में नहीं है। भगवान जाने मुझे अपने पोते का चेहरा देखने को मिलेगा भी या नहीं! खैर, भगवान ने ये जोड़ी बनाई है तो कुछ सोच-समझ कर ही बनाई होगी।
कुछ साल और बीत गए। एक दिन की बात है, उस दिन मटके की पत्नी रेवती बहुत गुस्से में आ गयी और चिढ़ कर कहने लगी, "पता नहीं मेरे माता-पिता ने इस मटके में ऐसा क्या देखा जो मुझे इसके साथ यहाँ पर भेज दिया! मेरी पूरी जिंदगी बर्बाद कर दी। मेरे भी अपने अरमान हैं, पति से कुछ उम्मीदें होती हैं। जी तो चाहता है कि इस मटके को फोड़ कर किसी जिंदा इंसान के साथ भाग जाऊँ!"
रेवती की ये कड़वी बातें मटके ने सुन लीं, उसको बहुत ही दुख हुआ। उधर उमा भी अपने मन में पछता रही थी, वह खुद को दोष दे रही थी कि मैंने अपनी जिद में इस जवान लड़की की जिंदगी खराब कर दी। ऐसा ही एक पछतावा मैंने हमारी पुरानी भूतिया हवेली की दास्तान में भी पढ़ा था। खैर फिर क्या था, मटके से अपनी माँ और पत्नी का यह दुख देखा नहीं गया।
वह मटका लुढ़कता हुआ गुस्से में रेवती के सामने चला गया और उसने रेवती को चुनौती दे डाली! मटके ने कहा, "ये तो शादी से पहले सोचना चाहिए था ना कि तेरे माता-पिता किसके साथ तेरी शादी कर रहे हैं? सिर्फ इस धन-दौलत के लालच में उन्होंने तुझे मेरे साथ रवाना कर दिया। कितने बेवकूफ हैं तेरे माता-पिता! अभी भी समय है, अगर तुझमें हिम्मत है तो उठा वह लाठी, मार मुझे और फोड़ डाल! रोज-रोज की इस किट-किट से मैं भी तंग आ गया हूँ। अगर आज तूने यह नहीं किया, तो मैं तेरे माँ-बाप को वो सजा दूंगा जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी। उठा लाठी और मार मुझे! 😡"
रेवती भी इस चुनौती और मटके द्वारा कहे गए कठोर वचनों को सहन नहीं कर पाई। ऊपर से अपने माता-पिता की बेइज्जती से उसका सब्र टूट गया। एक बार तो उसने विचार किया कि कुछ भी हो, ये मटका आखिर है तो मेरा पति ही, लेकिन किसी बेजान सी दिखने वाली वस्तु के लिए मैं अपनी पूरी जिंदगी खराब नहीं होने दूँगी! यही वो मौका है रेवती, फोड़ दे इस मटके को और जी ले अपनी जिंदगी!
रेवती ने गुस्से में लाठी की तरफ देखा और धीरे-धीरे उसकी तरफ अपना हाथ बढ़ाकर उस लाठी को पकड़ लिया। उधर उमा दौड़ती हुई रेवती को रोकने आई और बोली, "नहीं बहू! ऐसा मत करो, मेरे बेटे को छोड़ दो!" लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। रेवती ने पूरे गुस्से में जोर से लाठी को हवा में घुमाया और उस मटके पर दे मारा... धड़ाम!!
लाठी पड़ते ही वह मटका चकनाचूर हो गया! उस मटके के फूटते ही अंदर से एक बेहद तेज रोशनी बिखरी। वह रोशनी इतनी ज्यादा थी कि कुछ देर तक रेवती और उमा को अपनी आँखों के सामने ठीक से कुछ दिखाई भी नहीं दे रहा था।
फिर एक अद्भुत चमत्कार हुआ! जैसे ही वह रहस्यमयी रोशनी हटी, सामने का नजारा देख कर उमा और रेवती दंग रह गयीं। उन्होंने देखा कि उस फूटे हुए मटके की जगह एक बेहद खूबसूरत, गोरे रंग और गठीले, मजबूत एवं लंबे कद-काठी वाला एक नवयुवक खड़ा था, जो दिखने में किसी दिव्य राजकुमार जैसा लग रहा था! रेवती की आँखें फटी की फटी रह गयीं, उसकी जबान गले में अटक गई क्योंकि उसने अपनी पूरी जिंदगी में उसके जैसा खूबसूरत और रोबीला मर्द नहीं देखा था।
उधर वह युवा रेवती को देख कर मुस्कुराया और उमा की तरफ मुड़ गया। उसने पास जाकर बड़े प्यार से बोला, "माँ, मैं हूँ तेरा मटका बेटा।" उमा को मानो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि वह अपने सामने एक मटके को इंसान के रूप में देख रही है। वह भाव-विभोर हो उठी और अपने बेटे की वास्तविक वापसी की खुशी में उसे गले से लगा लगा लिया। उमा ने मन ही मन रोते हुए भगवान कृष्ण को धन्यवाद दिया!
इसके बाद उस युवा लड़के का नामकरण संस्कार किया गया। जल्द ही पंडित जी ने उसका नाम 'मुरलीधर' रखा। उमा को यह नाम बहुत ही पसंद आया, आखिर भगवान कृष्ण ने ही तो वह बेटा उसकी खाली झोली में डाला था। फिर सभी हंसी-खुशी से रहने लगे। रेवती को भी अब अपने सपनों का राजकुमार मिल चुका था, उसने अपने गुस्से और खराब व्यवहार के लिए उमा और मुरलीधर से हाथ जोड़कर माफी मांगी।
उमा और मुरलीधर ने भी बड़े दिल से रेवती को माफ कर दिया। फिर समय गुजरा, रेवती ने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया और इस प्रकार से उमा का वो अधूरा सपना भगवान की असीम कृपा से पूरा हुआ। और इसी के साथ ही यह लोककथा यहीं खत्म होती है।
फिर मैंने दादी से कहा, "दादी कहानी तो बहुत ही मस्त थी! आजकल इंटरनेट पर जो डार्क वेब लाइवस्ट्रीम की डरावनी कहानियाँ मिलती हैं, उनसे तो यह लोककथा कई गुना बेहतर और सीख देने वाली है।" दादी बोलीं, "मस्त के बच्चे अब सो जा, रात बहुत हो चुकी है। मुझे भी कल बाजार जाना है कुछ जरूरी सामान लाने और तुझे भी तो सुबह जल्दी उठ कर स्कूल जाना है। ला वह कंबल मुझे दे और सो जा।" मैं भी झट से कंबल ओढ़ कर सो गया।
Read This story In English: What Inside the Magic Pot? The Final Chapter
तो ये थी दोस्तों वह कहानी जो मेरी दादी ने मुझे सुनाई और मेरे जरिए आपने भी पढ़ी! उम्मीद है आपको यह कहानी पसंद आई होगी। अगर हाँ, तो फटाफट से कमेंट कर दो और इस ब्लॉग को फॉलो कर लो क्योंकि और भी मजेदार और रहस्यमयी कहानियाँ यहाँ पब्लिश होने वाली हैं। 😌